REVIEW ''सरकार 3'': सितारों की भीड़ में कहानी कहीं गुम हो गई

Friday, May 12, 2017 8:07 PM
REVIEW ''सरकार 3'': सितारों की भीड़ में कहानी कहीं गुम हो गई

मुंबईः सरकार 3 की भारी-भरकम कास्ट में कई शानदार अभिनेता हैं, लेकिन फिल्म को देखना शुरुआत से ही मुश्किल है। आरजीवी सरकार 3 में किसी नौसिखिए निर्देशक की तरह हैं जो वह सबकुछ दिखा देना चाहता है जो उसे लगता है कि वह कर सकता है। हर सीन के सात एंगल हैं और सभी के सभी परेशान करते हैं। बैकग्राउंड संगीत इतना खराब लगता है कि आपको बेकार के डायलॉग झेलने लायक लगने लगते हैं। पूरी फिल्म एक ऐसे 'सेपिया' टोन में हैं कि आपको नींद आने लगती है।

काश रामगोपाल वर्मा ट्वीट करने के बजाय कुछ समय अपनी निर्देशक क्षमता को बेहतर बनाने में लगाते। भाष नागरे या सरकार (अमिताभ बच्चन) महाराष्ट्र के एक बेहद पावरफुल पॉलिटिकल फैमिली का एक वृद्ध सदस्य, जिनके आधिपत्य का लोग आज भी लोहा मानते हैं। सरकार फिल्म के मुख्य आकर्षण हैं, क्योंकि उनकी विशाल ताकत दर्शकों को उनसे जोड़ती है। 'सरकार' फैंचाइज़ी की इस फिल्म में सरकार के साथ उनके पोते शिवाजी नागरे (अमित साध) नज़र आ रहे हैं, जो कि अपने दादा से जितना प्यार करता है, उतनी ही नफरत भी। क्या शिवाजी सुभाष को धोखा देता है? या फिर वह अपने दादा के ही षड्यंत्र का शिकार हो जाता है? 

पिछली फिल्म में अपने दोनों बेटों विष्णु (के.के. मेनन) और शंकर (अभिषेक बच्चन) को खोने के बाद उनकी उम्र तो बढ़ी नज़र आ रही है, लेकिन स्वभाव में आज भी वह उतने ही सख्त दिख रहे। अब वह कई चीजों से खुद को अलग कर चुके हैं, क्योंकि उनका काम उनके दोनों सहयोगी गोकुल (रॉनित) और रमन (पराग) देखते हैं। उनकी पत्नी पुष्पा (सुप्रिया) बीमार रहा करती हैं और वह पूरी तरह उनकी देखभाल में लगे रहते हैं। कहानी सरकार के पोते शिवाजी उर्फ चीकू की एंट्री के साथ आगे बढ़ती है। उसे गोकुल में उन गद्दारों के बारे में पता लग जाता है, जो गुपचुप तरीके से डॉन बनने की तैयारी में है। यहां तक कि सत्ता के संघर्ष के लिए नागरे की चारदीवारी के बाहर भी गोविंद देशपांडे (मनोज बाजपेयी), सत्ता का भूखा और नेता बनने की इच्छा रखने वाले दुबई बेस्ड बिज़नसमैन माइकल (जैकी) और गांधी (बजरंगबली) जैसे लोग सरकार को बर्बाद करने के लिए अपना-अपना दांव लगाते हैं। 

अब सबसे अहम सवाल- क्या 'शिवा', 'सत्या', 'कंपनी' और 'सरकार' का पहला पार्ट बनाने वाले रामगोपाल वर्मा अपनी पुरानी फॉर्म में लौट आए हैं? इस फिल्म में आपको फिल्ममेकर रामगोपाल वर्मा की इन्टेंसिटी की कुछ झलक दिखती है। उनकी महाभारत रूपी कथा या राजमहल की राजनीति भी आप कह सकते हैं, वह बिना किसी रुकावट के पर्दे पर चलती है। हालांकि फिल्म की हर साजिश को लेकर आप बड़ी आसानी से अंदाज़ा लगा लेते हैं। 

बता दें फिल्म के कई डायलॉग काफी अर्थपूर्ण हैं, लेकिन यह फिल्म को बहुत ज्यादा असरदार नहीं बना पाते। इस फ्रैंचाइजी की बाकी फिल्मों की ही तरह इस फिल्म में भी लाइट और शैडो का बेहतरीन इस्तेमाल किया गया है, जो फिल्म का ट्रेडमार्क है। साथ ही गोविंदा-गोविंदा वाला बैकग्राउंड स्कोर, इस फिल्म में शानदार है। बच्चन द्वारा गाई गई गणेश आरती आपको मंत्रमुग्ध करने वाला है। इसके अलावा अमिताभ की ऐक्टिंग और अंदाज़ भी आपको अभिभूत करने के लिए काफी हैं। उनके फैन्स के लिए इसे एक शानदार तोहफा कह सकते हैं। 

 



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