Movie Review: ''बाबा ब्लैक शीप''

Friday, March 23, 2018 10:33 AM
Movie Review: ''बाबा ब्लैक शीप''

मुंबई: एक्टर मनीष पॉल और अनुपम खेर की फिल्म 'बाबा ब्लैक शीप' आज रिलीज हो गई है। फिल्म की कहानी की बात करें तो यह सलीके से शुरू होती है, जो गोवा में रह रहे बाबा (मनीष पॉल) की कहानी है, जिसके पिता चारुदत्त शर्मा उर्फ चार्ली (अनुपम खेर) की काजू की दुकान है। पिता घर पर स्वेटर बुनते हैं और बाबा की मां के डर से घर के बर्तन धोने जैसे सारे काम भी करते हैं, लेकिन अचानक एक दिन मालूम पड़ता है कि बाबा के पिता जो हमेशा घर में डरे-सहमे से रहते हैं, असल में एक कॉन्ट्रैक्ट किलर हैं। 12 पीढ़ियों से उनका परिवार पैसों के लिए लोगों की जान लेता आया है। बाबा को भी न चाहते हुए इस फैमिली बिजनस में शामिल होना पड़ा है, मगर उसके लिए मुश्किलें तब पैदा होती हैं, जब वहां का एक भ्रष्ट मुख्यमंत्री उत्पल (मनीष वाधवा) अपने राजनीतिक वर्चस्व को कायम रखने के लिए माफिया, ड्रग डीलर के साथ-साथ कॉन्ट्रैक्ट किलर्स का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करता है।

कहानी के दूसरे ट्रैक में नकली पेंटिंग की जालसाजी करने वाला ब्रायन मोरिस उर्फ सांता क्लॉज (अन्नू कपूर) है। उसकी बेटी ऐंजिलीना (मंजरी फडनीस) से बाबा प्यार करता है और उससे शादी करना चाहता है, मगर एक मोड़ पर चार्ली और मोरिस का भी टकराव होता है। वहां भ्रष्ट मुख्यमंत्री उत्पल, चार्ली को अपने राजनितिक फायदे के लिए मरवाना चाहता है। इस प्लॉट के साथ साथ कहानी में एक ईमानदार पुलिस अफसर (के के मेनन) का भी ट्रैक है, जो बाबा की सहायता को तत्पर रहता है। 

निर्देशक विश्वास पंड्या ने इस फिल्म की घोषणा दो साल पहले की थी। उन्हें मनीष पॉल, अनुपम खेर, अन्नू कपूर और के के.मेनन जैसे समर्थ कलाकारों का साथ मिला, मगर वे कहानी को किसी सिरे तक नहीं पहुंचा पाए। कहानी में कई ट्रैक हैं, मगर सभी एक-दूसरे में गड्डमड्ड होकर घोर कन्फ्यूजन पैदा करते हैं। फिल्म की प्रॉडक्शन वैल्यू कमजोर होने के कारण कई दृश्य सीरियल का फील देते हैं। ढीले-ढाले स्क्रीनप्ले और बिखरी हुए एडिटिंग के कारण कोई भी दृश्य अपना प्रभाव नहीं जमा पाता। 

अभिनय के मामले में मनीष पॉल ने अच्छी कोशिश की है, मगर उनके चरित्र को समुचित रूप से विकसित नहीं किया गया है। यही वजह है कि वे अपना प्रभाव नहीं छोड़ पाए हैं। अनुपम खेर और अन्नू कपूर दमदार कॉमिडी परोसने के चक्कर में ओवर ऐक्टिंग का शिकार नजर आए हैं। गिने-चुने दृश्यों के अलावा ये धुरंधर हंसाने में नाकाम रहे हैं। के के.मेनन अपनी प्रेरक भूमिकाओं के लिए जाने जाते हैं, मगर यहां पुलिस अफसर एसीपी शिवराज नाईक की भूमिका में उन्हें भी जाया कर दिया गया है। ऐंजिलीना मोरिस की भूमिका में मंजरी फडनीस भी अपने किरदार के साथ न्याय नहीं कर पाई हैं। होम मिनिस्टर उत्पल शिवलकर की भूमिका में मनीष वाधवा याद रह जाते हैं। सहयोगी कलाकार महज खानापूर्ति करते नजर आते हैं। फिल्म में शान, गौरव दासगुप्ता और रोशन बालू जैसे तीन-तीन संगीतकार हैं, मगर गाना सिर्फ 'हीर' याद रह जाता है और वह भी फिल्म समाप्त होने के बाद आता है। 



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